सहमति से बने संबंध वाले पॉक्सो केस रद्द करने के लिए दिल्ली हाई कोर्ट ने जारी की ये गाइडलाइंस

Himachali Khabar: पॉक्सो एक्ट में कई बार ऐसे मामले सामने आते हैं जिसमें रिश्ते लड़का और लड़की की सहमति से बने होने की बात कही जाती है. इसके बारे में लड़की की तरफ से खुद स्पष्टता दी जाती है. लड़की कानूनी लड़ाई न लड़ने की अपील करती है क्योंकि उस मामले में दोनों की शादी की जा चुकी होती है, लेकिन चूंकि लड़की की उम्र 18 साल से कम होती है, ऐसे में उसे de-juré victim यानी कानूनी रूप से पीड़िता मान लिया जाता है. ऐसे में दिल्ली हाई कोर्ट ने गुरुवार को POCSO एक्ट के तहत दर्ज मामलों को कब रद्द किया जा सकता है, इसको लेकर कई सिद्धांत निश्चित किए गए.
जस्टिस अनुप जैराम भांभानी ने इससे जुड़ा अहम फैसला दिया है.

सहमति से बने संबंध वाले पॉक्सो केस रद्द करने के लिए दिल्ली हाई कोर्ट ने जारी की ये गाइडलाइंस
सहमति से बने संबंध वाले पॉक्सो केस रद्द करने के लिए दिल्ली हाई कोर्ट ने जारी की ये गाइडलाइंस

कोर्ट ने कहा कि POCSO एक्ट के तहत आपराधिक कार्यवाही को रद्द करना कानून के खिलाफ नहीं है. उन्होंने कहा कि लेकिन ऐसी परिस्थिति को बहुत ही गंभीरता से लिया जाना चाहिए. कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों को रद्द करने के लिए तथ्यों और परिस्थितियों पर बहुत सावधानी और संवेदनशीलता से समझने और विचार करने की जरूरत है. ye khabar aap himachali khabar me padh rhe hai

‘कारणों का सावधानी से हो मूल्यांकन’

कोर्ट ने कहा कि POCSO एक्ट के तहत किसी अपराध को रद्द करने की याचिका पर विचार किया जाता है तो कोर्ट को उन कारणों का बहुत सावधानी से मूल्यांकन करना चाहिए कि आखिर क्यों पीड़िता यह मानने से इनकार कर रही है. उसे कोई नुकसान या चोट पहुंची है. क्या वो किसी के दबाव में तो ऐसा नहीं कर रही है. कोर्ट को इस बात पर अपनी संतुष्टि भी दर्ज करनी चाहिए. ये चीजें उन मामलों पर होंगी जो कानूनी तौर पर पीड़ित (de-juré victim) की सहमति पर आधारित होती हैं.

कोर्ट ने कहा कि अदालतों को उन अपराधियों के प्रति सतर्क रहना चाहिए जो अपने पक्ष में आपराधिक कार्यवाही रद्द करवाने के लिए धोखे, चालबाजी या बेईमानी के तरीकों का इस्तेमाल करते हैं. कोर्ट ने कहा कि POCSO एक्ट के तहत आने वाले अपराधों से जुड़ी आपराधिक कार्यवाही रद्द करने के लिए, सहमति के संबंध में मजबूत सुरक्षा उपाय और नियम तय करना जरूरी है.

जज ने कहा कि ऐसे मामलों में अदालतों को इस बात से संतुष्ट होना चाहिए कि आपराधिक कार्यवाही रद्द करने पर ‘कोई आपत्ति नहीं’ (no-objection) देते समय, पीड़ित (de-juré victim) सचमुच अपनी मर्जी और इच्छा से काम कर रही है. उसे ऐसी आपत्ति न देने के लिए गुमराह, दबाव में या धोखे में तो नहीं डाला गया है. कोर्ट ने यहा भी साफ किया है कि अगर लड़की और लड़के के बीच समझौता या शादी हो जाती है तो अदालत को ये देखना होगा कि ये समझौता वाकई में सच्चा है या फिर केस और कानूनी प्रक्रिया से बचने के लिए ऐसा किया गया है.

इन चीजों पर भी गौर करना जरूरी

  1. क्या दोनों पक्ष लंबे समय से एक परिवार की तरह साथ रह रहे हैं?
  2. क्या दोनों पक्षों के बच्चे हैं, जिनका भविष्य भी आपराधिक कार्यवाही को रद्द न करने के फैसले से प्रभावित होगा?
  3. क्या अपराधी पर पीड़िता के साथ किसी भी तरह की हिंसा या क्रूरता करने का आरोप है?
  4. संबंधित समय पर अपराधी और कथित पीड़ित की उम्र क्या थी?

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