Ek Din Review: ‘एक दिन’ की कहानी खत्म होने में लगा जमाना, जानें क्या जुनैद-साई पल्लवी आपका दिन बना पाएंगे?

Himachali Khabar: Ek Din Review In Hindi: आमिर खान के बड़े बेटे जुनैद खान अपनी दूसरी फिल्म ‘एक दिन’ के साथ बड़े पर्दे पर हाजिर हुए हैं. साथ में हैं साउथ की ‘नेचुरल स्टार’ साई पल्लवी. सुनने में तो कॉम्बो बढ़िया लगता है. लेकिन कभी-कभी कोई फिल्म ट्रेलर में जितनी दिलचस्प लगती है, पर्दे पर उतनी असरदार नहीं बन पाती. एक दिन भी कुछ ऐसी ही फिल्म है.

Ek Din Review: ‘एक दिन’ की कहानी खत्म होने में लगा जमाना, जानें क्या जुनैद-साई पल्लवी आपका दिन बना पाएंगे?
Ek Din Review: ‘एक दिन’ की कहानी खत्म होने में लगा जमाना, जानें क्या जुनैद-साई पल्लवी आपका दिन बना पाएंगे?

जुनैद खान और जैसे दो अच्छे कलाकार, जापान की शानदार लोकेशंस, एक दिन में सिमटी प्रेम कहानी और किस्मत बनाम प्लानिंग वाला भावुक आइडिया…सुनने में तो सब कुछ अच्छा लगता है. लेकिन क्या ये फिल्म आज की ऑडियंस के गले उतरेगी? क्या ये फिल्म आपको थिएटर तक खींचने का दम रखती है या फिर इसे ओटीटी के लिए बचाकर रखना ही बेहतर था? आइए इस पर विस्तार से चर्चा करते हैं.

कहानी

फिल्म की कहानी दिनेश (जुनैद खान) के इर्द-गिर्द घूमती है. दिनेश एक ऐसा कंप्यूटर गीक है जिसे उसके ऑफिस में ‘मिस्टर इंडिया’ या ‘इनविजिबल मैन’ कहा जाता है. मतलब वो है तो सही, पर किसी को उसकी मौजूदगी का एहसास नहीं. दिनेश को अपनी कलीग मीरा (साई पल्लवी) से एकतरफा प्यार है. मीरा चुलबुली है, खूबसूरत है और हर सीन में जान फूंक देती है.

कहानी में ट्विस्ट तब आता है जब ऑफिस की पूरी टीम जापान के सपोरो जाती है. सपोरो का मशहूर ‘स्नो फेस्टिवल’ चल रहा है. यहां मीरा के साथ एक हादसा होता है और उसकी याददाश्त एक दिन के लिए (टेम्पररी अमनेशिया) चली जाती है. दिनेश को लगता है कि ये भगवान का इशारा है और आगे क्या होता है ये जानने के लिए आपको थिएटर में जाकर ‘एक दिन’ देखनी होगी. ye khabar aap himachali khabar me padh rhe hai

कैसी है फिल्म

आज का दर्शक या तो बड़े स्केल की मसाला फिल्में पसंद कर रहा है, या फिर जमीन से जुड़ी कहानियां, हॉरर कॉमेडी, तेज रफ्तार थ्रिलर या दमदार रोमांटिक ड्रामा. एक दिन इनमें से किसी खांचे में फिट नहीं बैठती. इस फिल्म का सबसे बड़ा ‘विलेन’ इसकी रफ्तार और इसका पुरानापन है. आज के दौर में जहां जनता को ‘पंचायत’ जैसा देसीपन या ‘स्त्री’ जैसा हॉरर-कॉमेडी मसाला चाहिए, वहां ये फिल्म एक सुस्त कछुए की तरह रेंगती है. फिल्म की कहानी में जो ‘बॉस और एम्प्लॉई’ वाला रोमांस दिखाया गया है, जहां बॉस शादीशुदा होते हुए भी झूठ बोलता है, वो सब 90 के दशक के घिसे-पिटे फॉर्मूले लगते हैं.

आमिर खान प्रोडक्शन की ये फिल्म भी एक ‘रीमेक’ है. आज जब हमारे मोबाइल में ओटीटी ऐप्स है, हम ओरिजिनल फिल्में देख सकते हैं, तो फिर वही कहानी दोबारा क्यों देखें? आमिर खान और रीमेक बनाने वाले बॉलीवुड फिल्ममेकर्स को ये समझना होगा कि दर्शक अब स्मार्ट हो गए हैं. अगर आपने क्लाइमेक्स में थोड़ा बदलाव कर भी दिया, तो भी फिल्म का आधार तो पुराना ही है. ये फिल्म अगर 15 साल पहले आती, तो शायद कल्ट क्लासिक बन जाती, लेकिन आज ये सिर्फ एक ‘ओटीटी वाली फिल्म’ लगती है जो गलती से थिएटर में आ गई.

डायरेक्शन, राइटिंग और टेक्निकल पक्ष

फिल्म के राइटर स्नेहा देसाई और स्पंदन मिश्रा ने थाई फिल्म के मुकाबले क्लाइमेक्स को थोड़ा ‘सेंसिबल’ बनाने की कोशिश की है, लेकिन फिल्म की बोरियत कम नहीं होती. डायरेक्शन की बात करें तो फिल्म बहुत ही ‘शांत’ है. अब जरूरी नहीं की हर वक्त ये शांति सुकून ही दे, कभी-कभी इसकी वजह से नींद भी आने लगती है.

मनोज लोबो की सिनेमैटोग्राफी फिल्म का इकलौता प्लस पॉइंट है. जापान की लोकेशन, बर्फ से ढकी वादियां और सपोरो का स्नो फेस्टिवल पर्दे पर बेहद खूबसूरत लगता है. राम संपत का बैकग्राउंड स्कोर भी कहानी की भावनाओं को थामने की कोशिश करता है, लेकिन जब नींव ही कमजोर हो, तो सजावट क्या काम आएगी?

एक्टिंग

जुनैद खान के साथ समस्या ये है कि वो ‘मेथड एक्टिंग’ के चक्कर में किरदार में कुछ ज्यादा ही घुस जाते हैं. ‘महाराज’ में उनका वो इंटेंस अंदाज चल गया था क्योंकि कहानी की डिमांड थी. लेकिन ‘एक दिन’ जैसी कमर्शियल फिल्म में वो इतने ‘नर्डी’ बन गए हैं कि भूल ही जाते हैं कि वो फिल्म के हीरो हैं. उनका लाउड होना और किरदार के प्रति जरूरत से ज्यादा डेडिकेशन कभी-कभी बनावटी लगने लगता है. जुनैद भाई, थोड़ा रिलैक्स कीजिए, हर सीन में दुनिया नहीं बदलनी होती!

वहीं साई पल्लवी इस फिल्म की जान हैं. वो एक ऐसी एक्ट्रेस हैं जो पत्थर में भी जान फूंक दें. उनकी स्क्रीन प्रेजेंस जबरदस्त है. हालांकि, फिल्म में उनके तमिलियन लहजे को जस्टिफाई किया गया है. उन्हें हिंदी डेब्यू के लिए इस सुस्त फिल्म को चुनने की क्या जरूरत थी, ये समझ से परे है और उनकी हिंदी सुनने के बाद अब डर तो इस बात का लग रहा है कि वो नितेश तिवारी की ‘रामायण’ में सीता का रोल कैसे निभाएंगी? बाकी कलाकारों ने भी अपने किरदारों को न्याय देने की पूरी कोशिश की है.

देखें या नहीं

जुनैद और साई पल्लवी की एक बुरी फिल्म नहीं है, लेकिन ये एक असरदार फिल्म भी नहीं बन पाती. ‘एक दिन’ एक ऐसी फिल्म है जिसे आप क्रिसमस की शाम को रजाई में दुबक कर ओटीटी पर देख सकते थे. थिएटर में इसके लिए पैसे खर्च करना थोड़ा मुश्किल फैसला होगा. अगर आप साई पल्लवी के डाई-हार्ड फैन हैं या आपको जापान की सैर मुफ्त में (टिकट के दाम पर) करनी है, तो आप इसे देख सकते हैं.

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